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बुधवार, 2 मई 2012

सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण एवं यशोधरा का वियोग

सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण एवं यशोधरा का वियोग 

यशोधरा भारतीय इतिहास की वह नारी है जिसके आँसू बहे तो लेकिन व्यर्थ नहीं गए । न तो किसी ने  इन आंसुओं  पोछा  और न ही उसे संजो कर ही रखा । आज भी बुद्ध के अवशेषों के लिए हम खाक छान  रहें हैं  और उसे संजो कर रखने की होड़ लगी है । देश विदेश सभी बुद्ध के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हैं । एक से एक मठ बनाये जा रहे हैं , लेकिन क्या किसी ने ये सोंचा कि बुद्ध को महान बनाने में यशोधरा का क्या योगदान था? क्या वो तड़पी   नहीं होगी जब युवावस्था में ही उनके पति उन्हें  छोड़ वैराग्य की ओर प्रस्थान कर गए ? कौन पत्नी होगी जो अपने पति से दूर रहना चाहेगी ? वो भी तब जब वो पहली बार माँ बनी हो । अपने संतान को उसके पिता के गोद में वो नहीं देखना चाहेगी ? एक नारी के ह्रदय पर क्या बीतती होगी ये तो वही जानती है।

          समाज भी वही  और लोग भी वही , बस काल  विशेष का फर्क । ताने तो यशोधरा को भी सुनने पड़े होंगे । जब तक सिद्धार्थ भगवन बुद्ध नहीं बने तब तक तो यशोधरा ही दोषी मानी जाती  होगी और लोग कहते होंगे कि इसमें अपने पति  को मोहित करने की क्षमता ही नहीं है या फिर सिद्धार्थ उसे पसंद ही न करते हों। जितनी मुंह  बातें होती होंगी और बेबस हो उसे सब सहन करना पड़ता होगा । अपने ही लोगों के बीच  बेगानी हो गयी होगी वो, पर उसमे इतनी हिम्मत तो  जरुर  थी कि वो वर्षों तक सब कुछ सहन कर पायी । आखिर  किसको उलाहना देती वो? खुद को या अपने पति को ? जो पति संसार के कल्याण के लिए उसे  सोयी अवस्था में छोड़ कर चला गया उसे दोष देकर क्या वो समाज के लिए अच्छा करती ?

एक विचारणीय प्रश्न .........................शेष अगली बार 

शनिवार, 3 मार्च 2012

महिला सशक्तिकरण वास्तविकता की ओर

                          बहुत कुछ बोला जा रहा है और स्पष्ट भी हो रहा है , महिलाएं हर ओर कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं , समय की गति के साथ महिलाओं ने भी चलना सीख लिया है । अबला से सबला की ओर बढ़ते उनके कदम आसान नहीं रहे और न ही निर्विघ्न । रास्ते मिलते गए और उनपर आती बाधाओं ने मार्ग अवरुद्ध भी किया लेकिन हौसला ऐसा रहा कि कदम बढ़ते चले गए।
                       हम उस देश नारी है जहाँ की आदर्श सीता हैं, सावित्री हैं । आज भी हमें यही आशीर्वाद दिया जाता है कि हम सीता की तरह धैर्यवान बने , सहनशील बने , अपना जीवन औरों के लिए समर्पित कर दें । हमारा भारतीय समाज आज भी एक आदर्श बहु और बेटी की कल्पना करता है लेकिन यह भी सही है कि अब भारतीय नारी बदल रही है । उसके आदर्श आज भी सीता ही है परन्तु वह सीता की तरह अन्याय को चुपचाप नहीं सहती है , आवाज उठाने लगी है , अपने  हक़ को पाने के लिए परिवार और समाज को खुलेआम चुनौती दे रही है । संघर्ष में वह अपना आदर्श सावित्री और झाँसी की रानी को मान रही है तो शालीनता में सीता को । संघर्ष उसके जीवन कसौटी है तथा वह इसमे सफल  होने के लिए कुछ भी कर सकती है। 
                    एक डाक्टर की पत्नी जो किसी विद्यालय में टीचर है , अपने पति के साथ रहने के लिए संघर्ष कर रही है , जबकि पति किसी और स्त्री को पसंद करता है और इसे तलाक देकर दूसरी शादी करना चाहता है। मै उनसे पूछी कि जब आपका पति किसी और के साथ रहना चाहता है तो आप उससे स्वयं अलग हो जाय। इस पर उसका जबाब बड़ा ही सटीक मुझे मिला ---------"अगर उसे मेरे साथ नहीं रहना था तो शादी क्यों की? मेरे साथ बिताये मेरे कीमती दस साल मुझे वापस क्र दे मैं भी उसका साथ छोड़ दूंगी।" मै भी उसके जज्बे को सलाम कर उसकी सहयोगी बन गयी हूँ , तो यही है नारी सशक्तिकरण। 
                भले ही समाज तरक्की कर रहा है लोगों के सोंच बदल रहे हैं लेकिन सम्स्यें भी वही हैं  , चाहे वो घरेलू हिंसा हो, या फिर दहेज़ की मार या फिर ऑफिस में शोषण , संघर्ष जारी है। अब नारी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ रही. इसका उदहारण बिहार में मिल जायेगा। यहाँ की महिलाएं पंचायत से लेकर उच्च स्तर तक अपनी पहुँच बना रही हैं।  सदियों से शोषित समाज की बालिकाएं साईकिल से विद्यालय जा रही हैं । अभी बिहार में आयोजित विश्व महिला कबड्डी , महिलाओं की बदलती सोंच की ओर बढ़ता एक और कदम है।