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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

सपने 

बोझिल आँखें 
नींद से भरी रातें 
सरकते समय को 
पकड़ने की कोशिश 
रोजमर्रा की भागमभाग 
फिर भी बनते सपने 
जो खुली आँखों से 
देखे जाते , गढ़े  जाते 
टूटते , फिर बनते 
यथार्थ और कल्पनाएँ 
जहाँ एकाकार होने को आतुर 
रुकने का नाम न लेती 
हाँफती सांसें 
सपनों के बीच 
भागती रातें 
करवटों में गुजरती रातें 
बहुत कुछ पाने की होड़ में 
दौड़ लगाते 
कभी न थकते 
उम्मीद से बने इरादे 
पुनः बढ़ते जाते 
सपनों के दायरे ।