बुधवार, 27 जून 2012
गुरुवार, 31 मई 2012
रेत का घर
बड़े प्रयत्न से रेत का घर
बना रही थी
वह नन्ही सी लड़की
एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक
पहुँच गए थे उसके नन्हे हाथ
तभी एक लहर
तोडती हुई चली गयी
उसके घर को
सब कुछ विनष्ट
एक ही पल में |
घर टूटने की उदासी स्पष्ट थी
उसके चेहरे पर
पर पुनः उसके हाथ
गढ़ने लगे
नए घर को
बीच-बीच में
समुद्र को देखती नजरें
मानो चुनौती देती कि
बाधाएँ आती रहेंगी
प्रयत्न चलता रहेगा |
बड़े प्रयत्न से रेत का घर
बना रही थी
वह नन्ही सी लड़की
एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक
पहुँच गए थे उसके नन्हे हाथ
तभी एक लहर
तोडती हुई चली गयी
उसके घर को
सब कुछ विनष्ट
एक ही पल में |
घर टूटने की उदासी स्पष्ट थी
उसके चेहरे पर
पर पुनः उसके हाथ
गढ़ने लगे
नए घर को
बीच-बीच में
समुद्र को देखती नजरें
मानो चुनौती देती कि
बाधाएँ आती रहेंगी
प्रयत्न चलता रहेगा |
शनिवार, 5 मई 2012
शेष भाग ...........यशोधरा का वियोग ........
दुःख तो बहुत यशोधरा को और इस बात का और अधिक था कि क्यों उसे सोते हुए छोड़ उसके स्वामी चले गए ? एक बार जगा तो दिया होता , वो भी उन्हें जी भर के देख कर तृप्त हो लेती , लेकिन सिद्धार्थ क्या जाने नारी मन की व्यथा , समर्पण और आत्मशक्ति । वो भी नारी के उस कमजोर पक्ष की ओर ही देखे, जहाँ वो ममता और करुणा की मूर्ति बन बिछोह बर्दाश्त नहीं कर पायेगी । उन्हें लगा यशोधरा उन्हें मनुहार कर रोक लेगी, बाधक बन जाएगी उनके मार्ग का , फिर उनका उदेश्य कैसे पूर्ण होगा, यही था शायद उनके मन में , परन्तु ऐसा नहीं था । यशोधरा अपने पति के वैराग्य मन को पहले सा जानती थी । यदि उसे रोकना होता तो वो पहले ही प्रयत्न नहीं करती ? पुत्र जन्म तक सिद्धार्थ भी उनके साथ थे, तो क्या वो पति की बातों से उनके ह्रदय का भाव नहीं जानती थी ? अवश्य जानती थी और उसे कोई मलाल नहीं था , बस दुःख इस बात का था कि स्वामी का दर्शन वह उस पवित्र बेला में न कर सकी जिस समय उनका महाभिनिष्क्रमण हो रहा था ।
यदि हम यशोधरा को कमजोर नारी मानेगे तो वो गलत होगा क्योंकि वर्षों लगे सिद्धार्थ को बुद्ध बनने में और तब तक वो , सामाजिक मानसिक प्रताड़ना को सहती रही । वो कमजोर होती तो कब का अपने प्राण त्याग दी होती । इतिहास यही कहता कि बुद्ध के गृह त्याग के पश्चात उनकी पत्नी यशोधरा इस विरह वेदना को सहन नहीं कर सकी और प्राण ही त्याग दिए , लेकिन नहीं वो जीवित रही और अपने पुत्र की अच्छी परवरिश की । उन्हें तो इंतजार था अपने पति के बुद्धत्त्व की प्राप्ति का । वह उस सुख का आनंद लेना चाहती थी जिसे सिद्दार्थ पाने के लिए व्याकुल थे और गृहत्याग किया । महाभिनिष्क्रमण को फलीभूत होते देखना चाहती थी वो ।
बुद्ध बनने के बाद पूरी दुनिया उन्हें भगवान् के रूप में पूजने लगी लेकिन यशोधरा फिर भी अकेली रह गयी उसके त्याग को किसी ने नहीं समझा । उसकी महत्ता को गौण क्यों कर दिया गया ?
बुधवार, 2 मई 2012
सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण एवं यशोधरा का वियोग
सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण एवं यशोधरा का वियोग
यशोधरा भारतीय इतिहास की वह नारी है जिसके आँसू बहे तो लेकिन व्यर्थ नहीं गए । न तो किसी ने इन आंसुओं पोछा और न ही उसे संजो कर ही रखा । आज भी बुद्ध के अवशेषों के लिए हम खाक छान रहें हैं और उसे संजो कर रखने की होड़ लगी है । देश विदेश सभी बुद्ध के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हैं । एक से एक मठ बनाये जा रहे हैं , लेकिन क्या किसी ने ये सोंचा कि बुद्ध को महान बनाने में यशोधरा का क्या योगदान था? क्या वो तड़पी नहीं होगी जब युवावस्था में ही उनके पति उन्हें छोड़ वैराग्य की ओर प्रस्थान कर गए ? कौन पत्नी होगी जो अपने पति से दूर रहना चाहेगी ? वो भी तब जब वो पहली बार माँ बनी हो । अपने संतान को उसके पिता के गोद में वो नहीं देखना चाहेगी ? एक नारी के ह्रदय पर क्या बीतती होगी ये तो वही जानती है।
समाज भी वही और लोग भी वही , बस काल विशेष का फर्क । ताने तो यशोधरा को भी सुनने पड़े होंगे । जब तक सिद्धार्थ भगवन बुद्ध नहीं बने तब तक तो यशोधरा ही दोषी मानी जाती होगी और लोग कहते होंगे कि इसमें अपने पति को मोहित करने की क्षमता ही नहीं है या फिर सिद्धार्थ उसे पसंद ही न करते हों। जितनी मुंह बातें होती होंगी और बेबस हो उसे सब सहन करना पड़ता होगा । अपने ही लोगों के बीच बेगानी हो गयी होगी वो, पर उसमे इतनी हिम्मत तो जरुर थी कि वो वर्षों तक सब कुछ सहन कर पायी । आखिर किसको उलाहना देती वो? खुद को या अपने पति को ? जो पति संसार के कल्याण के लिए उसे सोयी अवस्था में छोड़ कर चला गया उसे दोष देकर क्या वो समाज के लिए अच्छा करती ?
एक विचारणीय प्रश्न .........................शेष अगली बार
गुरुवार, 12 अप्रैल 2012
खिलने तो दो फूल बनकर
खिलने तो दो फूल बनकर
आफरीन गयी सदा के लिए,
जाते तो सभी हैं समय के साथ
लेकिन बेटियों का क्या कसूर
जन्म लेते ही छीन ली जाती जिन्दगी
उनके हिस्से की ख़ुशी
वो मुस्कराहट और ममता
घिनौने से सच को
रोकोगे कब तुम?
वो नन्हीं कली है
बस खिलने तो दो,
फूल बन कर वो
बगिया को महकाएगी
आगे बढ़कर वो
संसार रच पायेगी ।
एक बेटी ही
बनवाती रिश्ते नए
जोड़ सबको वो गढ़ती है
सपने नए
तो खिलने दो उसको भी
एक फूल बनकर
न रोको उसे
जीने दो जी भर के।
गुरुवार, 5 अप्रैल 2012
भगवान महावीर : अहिंसा का सन्देश
भगवान महावीर : अहिंसा का सन्देश
अहिंसा परमो धर्म:, भगवान महावीर ने अहिंसा की परिधि का विस्तार किया है । यह अहिंसा सिर्फ पशु वध के रोक तक सीमीत नहीं है बल्कि भगवान महावीर के अहिंसा का विस्तार बहुत दूर तक है । इसमे मन को भी अहिंसा का रूप धारण करने को कहा गया है अर्थात हमें अपने मन को शुद्ध रखना चाहिए , किसी के प्रति दुर्विचार नहीं रखनी चाहिए और न ही किसी को अपनी कडवी बातों से चोट पहचानी चाहिए । यह सही है कि सत्य कडवा होता है लेकिन यदि इससे किसी के ह्रदय को चोट पहुंचे तो यह तो हिंसा ही हुआ क्योंकि यह चोट भी गहरा जख्म देता है । अतः इसे भी हिंसा की श्रेणी में रहनी चाहिए ।
मनुष्य को मन, वचन और कर्म से हिंसा नहीं करनी चाहिए । हमारी कठोर वाणी भी हिंसा की श्रेणी में ही आती है । पर हम भगवान महावीर की जयंती तो मानते है लेकिन कभी उनके सिधान्तों पर अमल नहीं करते । मानव अपनी इस प्रवृति को छोड़ नहीं पाता और जब भी मौका मिलता वह शब्द वाणों को चला ही देता है जो ऐसे होते है की भीतर तक घाव करते हैं।
अहिंसा के महाव्रत ने पूरे विश्व को शांति का सन्देश दिया है , रास्ता दिखाया है और मानव के ह्रदय में प्रेम का सन्देश अर्पित किया है । भगवान् महावीर ने कहा है कि हर जीव को जीने का अधिकार है , जियो और जीने दो । यह सन्देश यदि अपना लिया जाय तो कल्याण स्वयं होगा । आज विश्व को इसी की आवश्यकता है ।
मंगलवार, 20 मार्च 2012
nirasha se aasha ki or badhte kadam
एक उत्साहपूर्ण कदम बढाया , जीवन चलने का नाम है यही कहा जाता है, पर क्यों बहुत कुछ अधूरा रह जाता है । कभी इतनी निराशा हो जाती है कि कोई मार्ग नजर ही नहीं आता । बंद हो जाते है सभी रास्ते , अपने भी बेगाने लगने लगते हैं । ऐसा लगता है जैसे हर कोई हँसता है चाहे वो निगाहें अच्छी क्यों न हो पर वो भी चिढाती नजर आती है । शायद सोंच यहीं पर आकर स्थिर हो जाता है और हम अपनी दुनिया सीमित कर अपनी सोंच को भी सीमित कर लेते हैं ।
किसी ने कहा मेरे जीवन में बहुत सारे फूल खिले पर अपना कोई नहीं लगा क्यों ? क्या मैंने उन्हें अपनाया नहीं या वे मेरे हो ही नहीं सके ?
सवाल का जबाब भी था मेरे पास पर ऐसा लग रहा था जैसे उत्तर अपना नहीं पराया हो , बहुत उदासी छा जाती है कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूढने में । तर्क -बितर्क में जीवन के बहुत से रहस्य अपने आप खुल जाते है । हम अपने लिए बहुत कुछ चाहते हैं पर जरुरी तो नहीं कि हर चीज हमें मिल ही जाय। पर मन ये मानने के लिए तैयार ही नहीं होता ।
निराशा तो सभी के जीवन में कभी न कभी आती है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि आदमी हार कर बैठ जाय । संघर्ष तो करना ही होगा क्योंकि यही जीवन कि वास्तविकता है । यह भी सही है कि समझाना आसान है पर अमल में लाना मुश्किल ।
और अंत में
कदम बढ़ा कि रस्ते खुद ही बनते जायेगे
जो कांटे भी होंगे तो वे भी फूल बनते जायेंगे
हो हौसला तो आग का दरिया भी पार कर सकेंगे
जीवन की चुनैतियों से हम खुद ही लड़ सकेंगे ।
किसी ने कहा मेरे जीवन में बहुत सारे फूल खिले पर अपना कोई नहीं लगा क्यों ? क्या मैंने उन्हें अपनाया नहीं या वे मेरे हो ही नहीं सके ?
सवाल का जबाब भी था मेरे पास पर ऐसा लग रहा था जैसे उत्तर अपना नहीं पराया हो , बहुत उदासी छा जाती है कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूढने में । तर्क -बितर्क में जीवन के बहुत से रहस्य अपने आप खुल जाते है । हम अपने लिए बहुत कुछ चाहते हैं पर जरुरी तो नहीं कि हर चीज हमें मिल ही जाय। पर मन ये मानने के लिए तैयार ही नहीं होता ।
निराशा तो सभी के जीवन में कभी न कभी आती है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि आदमी हार कर बैठ जाय । संघर्ष तो करना ही होगा क्योंकि यही जीवन कि वास्तविकता है । यह भी सही है कि समझाना आसान है पर अमल में लाना मुश्किल ।
और अंत में
कदम बढ़ा कि रस्ते खुद ही बनते जायेगे
जो कांटे भी होंगे तो वे भी फूल बनते जायेंगे
हो हौसला तो आग का दरिया भी पार कर सकेंगे
जीवन की चुनैतियों से हम खुद ही लड़ सकेंगे ।
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