शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

अधखिली कली




पहाड़ी के पीछे 
दिख रही थी 
एक अधखिली कली
सकुचाई, थोड़ी सिमटी 
बाहर  आने को आतुर 
अपने स्वरुप को तराशती 
हवा के संग झूमती 
बादलों की ओर देखती 
मोहक मुस्कान बिखेरती …………….  

अभी कल ही तो खिली थी 
आज तोड़  ली गयी 
खिलने से पहले ही 
नीले आसमान ने देखा 
उसकी बेबसी , लाचारी 
बादलों ने गरज कर की 
विरोध की तैयारी 
कड़कती बिजलियों ने 
शोर भी मचायी ………. 

सब कुछ व्यर्थ 
अनछुई न रह पायी 
पहाड़ी के पीछे 
अब नहीं रही 
अधखिली कली …………… 


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर भाव
    अच्छी रचना

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  2. लाजवाब अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  3. हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} के शुभारंभ पर आप को आमंत्रित किया जाता है। कृपया पधारें!!! आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा |

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