गुरुवार, 31 मई 2012

  रेत का घर

बड़े प्रयत्न से रेत का घर
बना रही थी
वह नन्ही सी लड़की
एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक
पहुँच गए थे उसके नन्हे हाथ
तभी एक लहर
तोडती हुई चली गयी
उसके घर को
सब कुछ विनष्ट
एक ही पल में |
घर टूटने की उदासी स्पष्ट थी
उसके चेहरे पर
पर पुनः उसके हाथ
गढ़ने लगे
नए घर को
बीच-बीच में
समुद्र को देखती नजरें
मानो चुनौती देती कि
बाधाएँ आती रहेंगी
प्रयत्न चलता रहेगा |

18 टिप्‍पणियां:

  1. एक लड़की का घर .... उसके ख्यालों में कभी टूटता नहीं . लहरों से लड़ने का हौसला वह कभी नहीं खोती

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बिलकुल हिम्मत होती है लड़कियों में

      हटाएं
  2. यदि आप अपने ब्लॉग की चर्चा पत्रिका में देना चाहें तो कृपया -
    एक संक्षिप्त परिचय तस्वीर ब्लॉग लिंक इमेल आईडी के साथ चाहिए , कोई संग्रह प्रकाशित हो तो संक्षिप ज़िक्र और कब से
    ब्लॉग लिख रहे इसका ज़िक्र rasprabha@gmail.com पर भेजें

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  4. एक बहुत बड़ी सीख है इसमें- अनदेखे की आशंका के बीच मनुष्य की अदम्य जिजीविषा का !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. बाधाएँ आती रहेंगी
    प्रयत्न चलता रहेगा |


    तो फिर सफलता भी निश्चित है....

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,सुंदर प्रशंसनीय रचना,,,,,
    समर्थक बन गया हूँ आपभी बने तो मुझे खुशी होगी,,,,,,,

    RESENT POST ,,,, फुहार....: प्यार हो गया है ,,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी कविता का भाव मन को स्पंदित कर गया । किसी भी कविता में भाव-प्रवणता का समन्वय उसे सार्थकता प्रदान करता है । मेरे नए पोस्ट 'खड़ी बोली का प्रतिनिधि कवि-मैथिलीशरण गुप्त" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बीच-बीच में
    समुद्र को देखती नजरें
    मानो चुनौती देती कि
    बाधाएँ आती रहेंगी
    प्रयत्न चलता रहेगा |

    ....बहुत खूब! बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  11. प्रयत्न ही सार्थक होता है .... सुंदर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं